गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार: लिविंग विल और सुप्रीम कोर्ट की नई दिशा
अब केवल सिद्धांत नहीं, व्यवहार में लागू हुआ “Right to Die with Dignity”
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को लंबे समय तक बनाए रखना संभव बना दिया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर संवैधानिक और मानवीय प्रश्न भी उभर कर सामने आया है—क्या हर परिस्थिति में किसी व्यक्ति को कृत्रिम साधनों के सहारे जीवित रखना आवश्यक है, या उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने जीवन के अंतिम चरण के बारे में स्वयं निर्णय ले सके? भारतीय न्यायपालिका ने “लिविंग विल” और “पैसिव यूथनेशिया” के माध्यम से इस प्रश्न का संतुलित और संवेदनशील समाधान प्रस्तुत किया है।
लिविंग विल एक ऐसा कानूनी दस्तावेज है, जिसमें कोई भी वयस्क और मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति पूर्व में यह निर्देश दे सकता है कि यदि वह भविष्य में असाध्य बीमारी या वेजिटेटिव अवस्था में पहुंच जाए, जहां उसके स्वस्थ होने की कोई वास्तविक संभावना न हो, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों पर अनावश्यक रूप से जीवित न रखा जाए। यह व्यवस्था व्यक्ति के “गरिमा के साथ जीने और मरने के अधिकार” का विस्तार है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता प्रदान की है।
भारत में इस विषय पर कानून का विकास मुख्यतः न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ है। वर्ष 2011 में Aruna Ramchandra Shanbaug v. Union of India में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार सीमित रूप में पैसिव यूथनेशिया को स्वीकार किया। इसके बाद वर्ष 2018 में Common Cause v. Union of India में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए लिविंग विल और पैसिव यूथनेशिया को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। आगे वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही निर्णय में संशोधन करते हुए प्रक्रिया को सरल बनाया, जिससे आम नागरिकों के लिए लिविंग विल बनाना और उसे लागू कराना अधिक सुलभ हो गया।
इसी क्रम में वर्ष 2026 का नवीनतम निर्णय भारतीय विधि इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है। Harish Rana Passive Euthanasia Case में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इन सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करते हुए एक ऐसे व्यक्ति के मामले में, जो लंबे समय से वेजिटेटिव अवस्था में था, जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति प्रदान की। न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की राय को महत्व देते हुए पेलिएटिव केयर के साथ गरिमामय मृत्यु सुनिश्चित करने के निर्देश दिए और यह स्पष्ट किया कि यह “मृत्यु देना” नहीं, बल्कि “अनावश्यक एवं निरर्थक चिकित्सा को समाप्त करना” है।
लिविंग विल बनाने की प्रक्रिया को भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है। यह एक लिखित दस्तावेज होती है, जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से दर्ज करता है। इसमें दो गवाहों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं और इसे नोटरी या गजेटेड अधिकारी द्वारा प्रमाणित कराया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, संबंधित अस्पताल में इसकी जानकारी देना भी आवश्यक होता है। जब इसे लागू करने की स्थिति आती है, तब मेडिकल बोर्ड की अनुमति अनिवार्य होती है, ताकि किसी प्रकार की त्रुटि या दुरुपयोग की संभावना न रहे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने लिविंग विल नहीं बनाई है, तब भी पैसिव यूथनेशिया पूरी तरह असंभव नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसी स्थिति में परिवारजन, चिकित्सक और मेडिकल बोर्ड मिलकर आवश्यक प्रक्रिया का पालन करते हुए निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, इस स्थिति में प्रक्रिया अधिक सावधानी और जांच के साथ पूरी की जाती है।
इस विषय में एक सामान्य भ्रम यह भी है कि क्या लिविंग विल के माध्यम से दवा देकर मृत्यु दी जा सकती है। इस संबंध में कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि लिविंग विल केवल पैसिव यूथनेशिया की अनुमति देती है, जिसमें केवल जीवन रक्षक उपकरण हटाए जाते हैं या कृत्रिम रूप से जीवन को आगे बढ़ाना रोका जाता है। किसी भी प्रकार की दवा देकर मृत्यु देना, जिसे एक्टिव यूथनेशिया कहा जाता है, भारत में पूर्णतः अवैध है।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णयों ने यह स्थापित कर दिया है कि “Right to Die with Dignity” अब केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक और लागू होने वाला संवैधानिक अधिकार है। लिविंग विल व्यक्ति को यह सुनिश्चित करने का अधिकार देती है कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी उसकी गरिमा, इच्छा और आत्मनिर्णय का सम्मान बना रहे। आज आवश्यकता है कि समाज में इस विषय पर व्यापक जागरूकता फैलाई जाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों को समझ सके और समय रहते उचित निर्णय लेकर अपने जीवन के अंतिम चरण को भी गरिमामय बना सके।
राकेश कुमार बिश्नोई अधिवक्ता राजस्थान उच्च न्यायालय
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